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mahabharat 12.345.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! एक समय ब्रह्मपुत्र नारदजी ने शास्त्रीय विधि से पहले देवकार्य (हवन-पूजन) किया और फिर पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) किया। 1॥   |   mahabharat अध्याय 12.345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.345.1 
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य नारद: परमेष्ठिज:।
दैवं कृत्वा यथान्यायं पित्र्यं चक्रे तत: परम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! एक समय ब्रह्मपुत्र नारदजी ने शास्त्रीय विधि से पहले देवकार्य (हवन-पूजन) किया और फिर पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) किया। 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Once upon a time, Brahmaputra Naradji first performed Devkarya (havan-worship) according to the classical method and then performed Pitrukarya (Shraddha-tarpan). 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)