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श्लोक 12.344.4  |
तपो हि तप्यतस्तस्य यत् स्थानं परमात्मन:।
न तत् सम्प्राप्नुते कश्चिदृते ह्यावां द्विजोत्तम॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| द्विजोत्तम! हम दोनों के अतिरिक्त तपस्या में तत्पर रहने वाला भगवान् के धाम को कोई दूसरा नहीं पहुँच सकता॥4॥ |
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| Dwijottam! Apart from both of us, no one else can reach the place of God who is engaged in penance. 4॥ |
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