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श्लोक 12.344.27  |
अवसत् स महातेजा नारदो भगवानृषि:।
तमेवाभ्यर्चयन् देवं नरनारायणो च तौ॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| महातेजस्वी भगवान नारद मुनि प्रतिदिन उन्हीं भगवान वासुदेव तथा नर-नारायण दोनों की पूजा करते हुए वहीं रहने लगे॥27॥ |
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| The great and brilliant Lord Narad Muni started living there daily, worshiping the same Lord Vasudev and the two Nara and Narayana. 27॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३४४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४४॥
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