श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 344: नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.344.25 
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तयोर्वाक्यं तपस्युग्रे च वर्ततो:।
नारद: प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणपरायण:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! घोर तपस्या में लगे हुए भगवान नर और नारायण के ये वचन सुनकर नारदजी ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और नारायण की शरण लेकर उनकी आराधना करने लगे॥ 25॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing these words of Lord Nara and Narayana who were engaged in severe penance, Narada folded his hands and bowed to them and took refuge in Narayana and started worshipping him.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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