श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 344: नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना  »  श्लोक 22-24
 
 
श्लोक  12.344.22-24 
विधिना स्वेन युक्ताभ्यां यथापूर्वे द्विजोत्तम।
आस्थिताभ्यां सर्वकृच्छ्रं व्रतं सम्यगनुत्तमम्॥ २२॥
आवाभ्यामपि दृष्टस्त्वं श्वेतद्वीपे तपोधन।
समागतो भगवता संजल्पं कृतवांस्तथा॥ २३॥
सर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे।
यद् भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम्।
सर्वं स ते कथितवान् देवदेवो महामुने॥ २४॥
 
 
अनुवाद
द्विजोत्तम! पहले हम दोनों अपने-अपने उत्तम कर्मों में तत्पर होकर तथा समस्त कष्टों को सहकर उत्तमव्रत के पालन में तत्पर होकर श्वेतद्वीप में उपस्थित हुए थे और वहाँ आपको देखा था। तपोधन! वहाँ आपने भगवान् से भेंट की थी और उनसे वार्तालाप किया था। ये सब बातें हम दोनों को भली-भाँति ज्ञात हैं। महामुने! प्राणियों सहित तीनों लोकों में जो भी शुभ या अशुभ घटित हुआ है, हो रहा है या होने वाला है, वह सब उस समय देवाधिदेव भगवान् श्रीहरि ने आपको बताया था। 22-24॥
 
Dwijottam! Earlier, both of us, engaged in our best deeds and being ready to observe the Uttamvrat with all the difficulties, were present in Shwetdweep and saw you there. Tapodhan! You met God there and conversed with him. All these things are well known to both of us. Mahamune! Whatever auspicious or inauspicious thing has happened, is happening or is going to happen in the three worlds including living beings, all that was told to you by the God of Gods, Lord Shri Hari at that time. 22-24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas