श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.341.51 
अपि हि पुराणे भवति एकयोन्यात्मकावग्नीषोमौ देवाश्चाग्निमुखा इति एकयोनित्वाच्च परस्परमर्हन्तो लोकान् धारयन्त इति॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
पुराणों में कहा गया है कि अग्नि और सोम एक ही मूल के हैं और समस्त देवताओं का मुख अग्नि ही है। एक ही मूल होने के कारण वे एक-दूसरे को सुख देते हैं और सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं॥ 51॥
 
It is said in the Puranas that Agni and Som are of one origin and the mouth of all the gods is Agni. Being of one origin, they give pleasure to each other and sustain all the worlds.॥ 51॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४१॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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