श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 98-99
 
 
श्लोक  12.340.98-99 
तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गत:।
एवमेष महाभाग: पद्मनाभ: सनातन:॥ ९८॥
यज्ञेष्वग्रहर: प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा।
निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम्।
प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम्॥ ९९॥
 
 
अनुवाद
भगवान् का यह उपदेश पाकर ब्रह्माजी भी शीघ्र ही अपने लोक को चले गए। इस प्रकार इन महान सनातन पुरुष भगवान पद्मनाभ को यज्ञों का प्रथम भोक्ता तथा सदा ही यज्ञों का पोषक एवं प्रवर्तक बताया गया है। वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओं के निवृत्तिधर्म का आश्रय लेते हैं और कभी लोगों की विचित्र मनोवृत्ति का विचार करके प्रवृत्तिधर्म की स्थापना करते हैं। 98-99॥
 
After receiving this advice from God, Brahma also soon went to his world. In this way, this great eternal man, Lord Padmanabha, has been described as the first enjoyer of the yagyas and always the nurturer and promoter of the yagyas. Sometimes they take shelter of Nivritdharma of Akshayadharmi Mahatmas and sometimes they establish Pravrittidharma by considering the strange mindset of the people. 98-99॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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