त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा।
यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति॥ ९६॥
प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिक:।
एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत॥ ९७॥
अनुवाद
यह भार तुम पर डालकर मैं स्वाभाविक रूप से धैर्य धारण करूँगा। जब-जब देवताओं का कार्य तुम्हारे लिए असह्य हो जाएगा, तब-तब मैं आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिए तुम्हारे समक्ष प्रकट होऊँगा। ऐसा कहकर भगवान हयग्रीव वहाँ से अन्तर्धान हो गए। 96-97।
By placing this burden on you, I will naturally be patient. Whenever the work of the gods becomes unbearable for you, then I will appear before you to preach self-knowledge. Saying this, Lord Hayagriva disappeared from there. 96-97.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥