श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 96-97
 
 
श्लोक  12.340.96-97 
त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा।
यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति॥ ९६॥
प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिक:।
एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
यह भार तुम पर डालकर मैं स्वाभाविक रूप से धैर्य धारण करूँगा। जब-जब देवताओं का कार्य तुम्हारे लिए असह्य हो जाएगा, तब-तब मैं आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिए तुम्हारे समक्ष प्रकट होऊँगा। ऐसा कहकर भगवान हयग्रीव वहाँ से अन्तर्धान हो गए। 96-97।
 
By placing this burden on you, I will naturally be patient. Whenever the work of the gods becomes unbearable for you, then I will appear before you to preach self-knowledge. Saying this, Lord Hayagriva disappeared from there. 96-97.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)