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mahabharat 12.340.8-9h: हे ब्रह्मन्! परंतु आपने मोक्ष को परम शांति और परम सुख बताया है। जो लोग मुक्त हो जाते हैं, वे पुण्य और पाप से मुक्त होकर हजारों किरणों से प्रकाशित भगवान नारायण में प्रवेश करते हैं, ऐसा मैंने सुना है।   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  12.340.8-9h 
मोक्षश्चोक्तस्त्वया ब्रह्मन् निर्वाणं परमं सुखम्।
ये तु मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिता:॥ ८॥
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीह शुश्रुम।
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! परंतु आपने मोक्ष को परम शांति और परम सुख बताया है। जो लोग मुक्त हो जाते हैं, वे पुण्य और पाप से मुक्त होकर हजारों किरणों से प्रकाशित भगवान नारायण में प्रवेश करते हैं, ऐसा मैंने सुना है।
 
O Brahman! But you have described Moksha as the ultimate peace and the ultimate happiness. Those who are liberated, being free from virtue and sin, enter the Lord Narayana, who is illuminated by thousands of rays, I have heard this. 8 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)