श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  12.340.75 
यतोऽहं प्रसृत: पूर्वमव्यक्तात् त्रिगुणो महान्।
तस्मात् परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पित:॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में अव्यक्त प्रकृति से प्रकट हुए त्रिगुणात्मक महाअहंकार से जिसकी स्थिति बहुत परे है, वह सम्पूर्ण चेतन जगत् का ज्ञाता माना जाता है ॥75॥
 
‘The one whose state is far beyond the threefold great ego that had manifested from the unmanifested nature in the past, is considered to be the knower of the entire conscious sphere. 75॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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