श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 67-68
 
 
श्लोक  12.340.67-68 
निर्माणमेतद् युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम्॥ ६७॥
मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह।
चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधीकारमीश्वरा:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
हे देवश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें कर्म-गुणों से उत्पन्न किया है, अतः हे जगत के स्वामी! कल्प के अंत तक तुम अपने अधिकार के अनुसार लोक-कल्याण का चिन्तन करते रहो।
 
'Greatest of the gods! I have created you with the qualities of action, therefore, O lords of the world! Until the end of the Kalpa, you should continue to think about the welfare of the people according to your authority.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)