श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.340.5 
सौतिरुवाच
जनमेजयेन यत् पृष्ट: शिष्यो व्यासस्य धीमत:।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सूतपुत्र ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! मैं आपसे पुराण विषयक वह प्रश्न कह रहा हूँ जो राजा जनमेजय ने बुद्धिमान व्यासजी के शिष्य वैशम्पायनजी से पूछा था॥5॥
 
The son of Suta said, “The best sage!” I am narrating to you the question related to the Puranas which King Janamejaya had posed to the wise Vyasji's disciple Vaishampayanaji. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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