श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.340.47 
ऊर्ध्वा दृष्टिर्बाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत्।
एकपादा: स्थिता: सर्वे काष्ठभूता: समाहिता:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
उनकी आँखें ऊपर की ओर टिकी हुई थीं, उनकी भुजाएँ भी ऊपर उठी हुई थीं। उनके मन एकाग्र थे। वे सभी एकाग्र थे और एक पैर पर खड़े होकर लकड़ी जैसे लग रहे थे। 47.
 
Their eyes were fixed upwards, their arms were also raised upwards. Their minds were concentrated. They were all concentrated and standing on one leg looked like wood. 47.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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