श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.340.13 
स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिता:।
दोष: कालपरीमाणे महानेष क्रियावताम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो लोग निश्चित समय में प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि फलों को प्राप्त करने के उद्देश्य से कर्म मार्ग अपनाते हैं, उनका सबसे बड़ा दोष यह है कि वे काल की सीमा में बँधे हुए ही अपने कर्मों का फल भोगते हैं ॥13॥
 
The biggest fault of those who adopt the path of action with the aim of attaining fruits like heaven etc., which are to be attained in a fixed period of time, is that they enjoy the fruits of their actions while being bound by the limits of time. ॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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