श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  12.340.119 
इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं
महात्मन: पुरुषवरस्य कीर्तितम्।
समागमं चर्षिदिवौकसामिमं
निशम्य भक्ता: सुसुखं लभन्ते॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
महापुरुष महात्मा महर्षि व्यासजी के कहे हुए इन तत्वदर्शी वचनों को तथा ऋषियों और देवताओं के मिलन-सम्बन्धी इस वृत्तान्त को सुनकर भक्तों को महान सुख प्राप्त होता है ॥119॥
 
By listening to these principled words spoken by the great man Mahatma Maharishi Vyas and this account related to the meeting of the sages and the gods, the devotees find great happiness. 119॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४०॥

 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas