श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  12.340.105 
तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि।
वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
जो तप, तेज, यश, वाणी और नदियों के स्वामी और सनातन रक्षक हैं, उन श्री हरि को नमस्कार है ॥105॥
 
Salutations to Shri Hari who is the master and eternal protector of austerity, brilliance, fame, speech and rivers. ॥105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)