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mahabharat 12.340.101: शिष्यों! तुम उसी अजन्मा, सर्वव्यापक रूप, सम्पूर्ण देवताओं के आश्रय, निराकार परमात्मा नारायणदेव को नमस्कार करते हो ॥101॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  12.340.101 
तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने।
अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम्॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
शिष्यों! तुम उसी अजन्मा, सर्वव्यापक रूप, सम्पूर्ण देवताओं के आश्रय, निराकार परमात्मा नारायणदेव को नमस्कार करते हो ॥101॥
 
Disciples! You salute the same unborn, universal form, the shelter of all the gods, the formless Supreme Soul Narayandev. 101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)