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mahabharat 12.339.9-10h: उस समय यज्ञों के स्वामी भगवान देवेश्वर विष्णु अपने हाथों में यज्ञवेदी, कमण्डलु, चमकते हुए रत्न, उपानह, कुशा, मृगचर्म, लकड़ी और जलती हुई अग्नि धारण किए हुए थे॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.339.9-10h 
वेदिं कमण्डलुं शुभ्रान् मणीनुपानहौ कुशान्।
अजिनं दण्डकाष्ठं च ज्वलितं च हुताशनम्॥ ९॥
धारयामास देवेशो हस्तैर्यज्ञपतिस्तदा।
 
 
अनुवाद
उस समय यज्ञों के स्वामी भगवान देवेश्वर विष्णु अपने हाथों में यज्ञवेदी, कमण्डलु, चमकते हुए रत्न, उपानह, कुशा, मृगचर्म, लकड़ी और जलती हुई अग्नि धारण किए हुए थे॥9 1/2॥
 
At that time, Lord Deveshwar Vishnu, the Lord of Yagyas, was holding the Yagya Vedi, Kamandalu, shining gems, Upanaha, Kusha, deer skin, stick-wood and burning fire in his hands. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)