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mahabharat 12.339.48: ब्रह्म! मैं सर्वव्यापी हूँ और समस्त प्राणियों का आत्मा हूँ। यदि सम्पूर्ण भूत समुदाय और शरीर नष्ट हो जाएँ, तो भी मेरा नाश नहीं होता ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.339.48 
अहं सर्वत्रगो ब्रह्मन् भूतग्रामान्तरात्मक:।
भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न नशाम्यहम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्म! मैं सर्वव्यापी हूँ और समस्त प्राणियों का आत्मा हूँ। यदि सम्पूर्ण भूत समुदाय और शरीर नष्ट हो जाएँ, तो भी मेरा नाश नहीं होता ॥48॥
 
'Brahman! I am omnipresent and the soul of all living beings. Even if the entire ghost community and bodies are destroyed, I am not destroyed. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)