श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  12.339.46-47 
मयैतत् कथितं सम्यक् तव मूर्तिचतुष्टयम्॥ ४६॥
अहं हि जीवसंज्ञातो मयि जीव: समाहित:।
नैवं ते बुद्धिरत्राभूद् दृष्टो जीवो मयेति वै॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
मैंने अपने चारों रूपों - वासुदेव, संकर्षण आदि का तुमसे भली-भाँति वर्णन किया है। मैं ही जीव नाम से प्रसिद्ध हूँ, जीव मुझमें ही स्थित है; परंतु तुम्हारे मन में ऐसा विचार न आए कि मैंने जीव को देखा है ॥ 46-47॥
 
'I have described my four forms Vasudeva, Sankarshana etc. to you very well. I am the one who is famous by the name of the living being, the living being exists in me only; but such a thought should not arise in your mind that I have seen the living being. ॥ 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)