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mahabharat 12.339.45-46h: नारद! जिस रूप में तुम मुझे देख रहे हो, वह माया मैंने ही रची है। ऐसा मत सोचो कि मुझमें सभी जीवों के गुण हैं।'   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  12.339.45-46h 
माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद॥ ४५॥
सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।
 
 
अनुवाद
नारद! जिस रूप में तुम मुझे देख रहे हो, वह माया मैंने ही रची है। ऐसा मत सोचो कि मुझमें सभी जीवों के गुण हैं।'
 
‘Narad! I have created Maya in the form in which you are seeing me. Do not think that I have the qualities of all living beings. 45 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)