श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.339.42 
मत्त: सर्वं सम्भवति जगत‍् स्थावरजङ्गमम्।
अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासच्चैव नारद॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
नारद! यह सम्पूर्ण स्थावर और चराचर जगत् मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। नाशवान और अविनाशी, सत् और असत् भी मुझसे ही प्रकट हुए हैं॥ 42॥
 
‘Narad! The entire mobile and immobile universe is born from me. The perishable and the imperishable, the unreal and the real, have also appeared from me.॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)