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mahabharat 12.339.36: ब्रह्म! जीव के बिना प्राणवायु कोई चेष्टा नहीं करती। उस जीव को ही शेष या भगवान संकर्षण कहते हैं। 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.339.36 
न च जीवं विना ब्रह्मन् वायवश्चेष्टयन्त्युत।
स जीव: परिसंख्यात: शेष: संकर्षण: प्रभु:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्म! जीव के बिना प्राणवायु कोई चेष्टा नहीं करती। उस जीव को ही शेष या भगवान संकर्षण कहते हैं। 36॥
 
'Brahman! Without the living being the vital air does not make any effort. That living being itself is called Shesha or Lord Sankarshan. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)