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mahabharat 12.339.35: शरीर में उनका प्रवेश ही सृष्टि का कारण कहा गया है। वे ही शरीर को क्रियाशील बनाते हैं। वे ही उसे चलाने में समर्थ हैं। पंचतत्वों के सम्मिलित समुदाय के बिना कहीं भी कोई शरीर नहीं है॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.339.35 
उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टयन् प्रभु:।
न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
शरीर में उनका प्रवेश ही सृष्टि का कारण कहा गया है। वे ही शरीर को क्रियाशील बनाते हैं। वे ही उसे चलाने में समर्थ हैं। पंचतत्वों के सम्मिलित समुदाय के बिना कहीं भी कोई शरीर नहीं है॥35॥
 
‘His entry into the body is itself said to be the cause of creation. He is the one who makes the body active. He is the one who is capable of operating it. There is no body anywhere without the combined community of the five elements.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)