श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.339.31 
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्क्रिये सम्प्रलीयते।
नास्ति तस्मात् परतर: पुरुषाद् वै सनातनात्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्म! अव्यक्त पुरुष में लय है। उस सनातन पुरुष से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। 31॥
 
'Brahman! Avyakta has rhythm in passive person. There is nothing better than that eternal man. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)