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mahabharat 12.339.30: वायु आकाश में लय है, आकाश मन में लीन है। मन एक उत्कृष्ट भूत है। वह अव्यक्त प्रकृति में लीन है। 30॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.339.30 
खे वायु: प्रलयं याति मनस्याकाशमेव च।
मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीयते॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वायु आकाश में लय है, आकाश मन में लीन है। मन एक उत्कृष्ट भूत है। वह अव्यक्त प्रकृति में लीन है। 30॥
 
‘Vayu is rhythm in the sky, sky merges in the mind. The mind is an excellent ghost. He is absorbed in the unmanifested nature. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)