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mahabharat 12.339.136-137h: व्यास जी सदैव आकाशमार्ग से अमृतनिधि क्षीर सागर के तट पर जाकर देवेश्वर श्री हरि की पूजा करके अपने आश्रम को लौट आते हैं ॥136 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 136-137h
 
 
श्लोक  12.339.136-137h 
गत्वान्तरिक्षात् सततं क्षीरोदममृताशयम्॥ १३६॥
पूजयित्वा च देवेशं पुनरायात् स्वमाश्रमम्।
 
 
अनुवाद
व्यास जी सदैव आकाशमार्ग से अमृतनिधि क्षीर सागर के तट पर जाकर देवेश्वर श्री हरि की पूजा करके अपने आश्रम को लौट आते हैं ॥136 1/2॥
 
Vyas ji always returns to his ashram after worshiping Deveshwar Shri Hari after going to the banks of Amritnidhi Ksheer Sagar through the sky. 136 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)