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वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड् जनमेजय॥ १३३॥
भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नारायणपराऽभवन्।
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! इस उत्तम कथा को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर और उनके सभी भाई भगवान नारायण के महान भक्त बन गए।
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing this excellent story, Dharmaraja Yudhishthira and all his brothers became great devotees of Lord Narayana. 133 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥