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mahabharat 12.339.127-128h: युधिष्ठिर! जैसे देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन करके अमृत निकाला था, वैसे ही प्राचीन काल में ब्राह्मणों ने सम्पूर्ण शास्त्रों का मंथन करके इस अमृतमयी कथा को यहाँ प्रकट किया है॥127 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 127-128h
 
 
श्लोक  12.339.127-128h 
सुरासुरैर्यथा राजन् निर्मथ्यामृतमुद्‍धृतम्॥ १२७॥
एवमेतत् पुरा विप्रै: कथामृतमिहोद्‍धृतम्।
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! जैसे देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन करके अमृत निकाला था, वैसे ही प्राचीन काल में ब्राह्मणों ने सम्पूर्ण शास्त्रों का मंथन करके इस अमृतमयी कथा को यहाँ प्रकट किया है॥127 1/2॥
 
Yudhishthira! Just as the Gods and the Demons churned the ocean to extract Amrit (nectar), similarly in ancient times the Brahmins churned all the scriptures and brought out this nectar-like story here.॥ 127 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)