श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 125-126h
 
 
श्लोक  12.339.125-126h 
इदमाख्यानमार्षेयं पारम्पर्यागतं नृप॥ १२५॥
नावासुदेवभक्ताय त्वया देयं कथंचन।
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! इस प्रकार ऋषि-सम्बन्धी यह कथा परम्परा से प्राप्त हुई है। जो भगवान वासुदेव का भक्त न हो, उसे किसी भी प्रकार से आपको यह उपदेश नहीं देना चाहिए। 125 1/2॥
 
Nareshwar! In this way, this story related to the sage has been received from the tradition. One who is not a devotee of Lord Vasudev, should not in any way give this advice to you. 125 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)