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mahabharat 12.339.109-110h: भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर जगत्रूपधारी अविनाशी भगवान नारायणदेव पुनः वहीं अन्तर्धान हो गए ॥109 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 109-110h
 
 
श्लोक  12.339.109-110h 
भीष्म उवाच
एवं स भगवान् देवो विश्वमूर्तिधरोऽव्यय:॥ १०९॥
एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तर्दधे पुन:।
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर जगत्रूपधारी अविनाशी भगवान नारायणदेव पुनः वहीं अन्तर्धान हो गए ॥109 1/2॥
 
Bhishmaji says – Yudhishthir! Saying these words, the immortal Lord Narayandev, who was in the form of the world, vanished again there. 109 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)