श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  12.335.8-9 
क्षीरोदधेर्योत्तरतो हि द्वीप:
श्वेत: स नाम्ना प्रथितो विशाल:॥ ८॥
मेरो: सहस्रै: स हि योजनानां
द्वात्रिंशतोर्ध्वं कविभिर्निरुक्त:।
अनिन्द्रियाश्चानशनाश्च तत्र
निष्पन्दहीना: सुसुगन्धिनस्ते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
क्षीरसागर के उत्तर में श्वेत नाम से प्रसिद्ध विशाल द्वीप उनके सामने प्रकट हुआ। विद्वानों ने उस द्वीप को मेरु पर्वत से बत्तीस हजार योजन ऊँचा बताया है। वहाँ के निवासी इन्द्रियशून्य, निराहार, पुरुषार्थहीन और ज्ञान से युक्त हैं। उनके शरीर के अंगों से उत्तम सुगन्ध निकलती है। 8-9॥
 
The huge island famous by the name of Shwet in the northern part of Kshirsagar appeared before them. Scholars have described that island as thirty-two thousand yojanas higher than Mount Meru. The residents there are devoid of senses, foodless, effortless and full of knowledge. An excellent fragrance emanates from their body parts. 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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