श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.335.25 
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मन:।
प्रायणं भगवत्प्रोक्तं भुञ्जते वाग्रभोजनम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उस महान राजा के घर में पंचरात्रशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान सदैव उपस्थित रहते थे; और भगवान् को अर्पित प्रसाद या भोजन को सबसे पहले वही खाते थे॥ 25॥
 
In the house of that great king the eminent scholars of the Pancharatra Shastra were always present; and he was the first to eat the prasad or food offered to the Lord.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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