श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.335.2 
नारद उवाच
यदर्थमात्रप्रभवेण जन्म
कृतं त्वया धर्मगृहे चतुर्धा।
तत् साध्यतां लोकहितार्थमद्य
गच्छामि द्रष्टुं प्रकृतिं तवाद्याम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले- प्रभु! आप ही सब वस्तुओं की उत्पत्ति के कारण हैं। जिस हेतु आपने धर्म के घर में चार रूपों में अवतार लिया है, कृपया लोक-कल्याण हेतु उस प्रयोजन को सिद्ध कीजिए। अब मैं आपके मूल स्वरूप (श्वेतद्वीप में स्थित) के दर्शन करने जा रहा हूँ।॥ 2॥
 
Naradji said-Prabhu! You are the reason for the origin of all things. For which you have taken incarnation in four forms in the house of Dharma, please accomplish that purpose for the welfare of the people. Now I am going to see your original form (situated in Shvetdvipa).॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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