श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  12.335.19-20 
सात्वतं विधिमास्थाय प्राक् सूर्यमुखनि:सृतम्।
पूजयामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान्॥ १९॥
पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च स:।
शेषान्नभुक् सत्यपर: सर्वभूतेष्वहिंसक:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
भगवान सूर्य के मुख से सर्वप्रथम प्रकट हुए वैष्णव शास्त्रों का आश्रय लेकर वे सर्वप्रथम परात्पर भगवान नारायण की पूजा करते थे। फिर उनकी सेवा से बची हुई वस्तुओं से पितरों का, पितरों की सेवा से बची हुई वस्तुओं से ब्राह्मणों तथा अन्य आश्रितों का सत्कार करते थे। बचे हुए अन्न को सबको देकर स्वयं खाते थे, सत्य पर दृढ़ रहते थे और किसी भी जीव की हिंसा नहीं करते थे। 19-20॥
 
Taking shelter of the Vaishnav scriptures which had first appeared from the mouth of Lord Surya, they would first worship the Supreme God Lord Narayana. Then they used to honor the ancestors with the things left over from their service, Brahmins and other dependents with the things left over from the service of the ancestors. He used to eat the leftover food after giving it to everyone, remained steadfast in the truth and did not do violence to any living being. 19-20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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