श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.335.16 
भीष्म उवाच
विस्तीर्णैषा कथा राजन् श्रुता मे पितृसंनिधौ।
यैषा तव हि वक्तव्या कथासारो हि सा मता॥ १६॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! यह कथा अत्यन्त विस्तृत है। मैंने इसे अपने पिता से सुना है। अब जो कथा आपको सुनाई जाती है, वह समस्त कथाओं का सार मानी जाती है॥16॥
 
Bhishmaji says - King! This story is very detailed. I heard it from my father. The story that is to be told to you now is considered to be the essence of all the stories.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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