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mahabharat 12.334.45: नारद! हे मुनि! आपमें भगवान के प्रति भक्ति और प्रेम है। आपमें हम लोगों के प्रति भी भक्ति है। इसीलिए हमने यह गुप्त बात आपसे कही है और आपको इसे सुनने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.334: बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 334: बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.334.45 
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्तित:।
भक्त्या प्रेम्णा च विप्रर्षे अस्मद्भक्त्या च ते श्रुत:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
नारद! हे मुनि! आपमें भगवान के प्रति भक्ति और प्रेम है। आपमें हम लोगों के प्रति भी भक्ति है। इसीलिए हमने यह गुप्त बात आपसे कही है और आपको इसे सुनने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है ॥ 45॥
 
Narada! O sage! You have devotion and love for God. You have devotion for us too. That is why we have described this secret matter to you and you have got the auspicious opportunity to listen to it. ॥ 45॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३४॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)