श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  12.332.28-29 
अब्रवीत् तास्तदा वाक्यं शुक: परमधर्मवित्।
पिता यद्यनुगच्छेन्मां क्रोशमान: शुकेति वै॥ २८॥
तत: प्रतिवचो देयं सर्वैरेव समाहितै:।
एतन्मे स्नेहत: सर्वे वचनं कर्तुमर्हथ॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तब महाज्ञानी शुकदेवजी ने उनसे कहा - 'देवियो! यदि मेरे पिता मेरा नाम पुकारते हुए यहाँ आएँ, तो तुम सब लोग सावधान होकर मेरी ओर से उन्हें उत्तर दो। तुम सबका मुझ पर बड़ा स्नेह है; अतः मेरी यह छोटी सी बात तुम सब स्वीकार करो।'॥ 28-29॥
 
Then the great religious scholar Shukdevji said to them, 'Ladies! If my father comes calling my name and comes here, then all of you should be alert and reply to him on my behalf. You all have great affection for me; therefore all of you should accept this small thing of mine.'॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)