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mahabharat 12.331.59: इसके लिए मैं नागों, पर्वतों, पृथ्वी, दिशाओं, स्वर्ग, देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, भूतों, सर्पों और राक्षसों की अनुमति चाहता हूँ। 59।   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  12.331.59 
आपृच्छामि नगान् नागान् गिरिमुर्वीं दिशोदिवम्।
देवदानवगन्धर्वान् पिशाचोरगराक्षसान्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
इसके लिए मैं नागों, पर्वतों, पृथ्वी, दिशाओं, स्वर्ग, देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, भूतों, सर्पों और राक्षसों की अनुमति चाहता हूँ। 59।
 
For this I seek the permission of the snakes, mountains, earth, directions, heaven, gods, demons, Gandharvas, ghosts, serpents and demons. 59.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)