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mahabharat 12.331.55: इसके अतिरिक्त चन्द्रमा भी घटता-बढ़ता रहता है। उसका घटता-बढ़ता चक्र कभी नहीं टूटता। ये सब बातें जानकर, मुझे चन्द्रलोक में जाने की अथवा घटता-बढ़ता चक्र में फँसने की कोई इच्छा नहीं है ॥55॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.331.55 
क्षीयते हि सदा सोम: पुनश्चैवाभिपूर्यते।
नेच्छाम्येवं विदित्वैते ह्रासवृद्धी पुन: पुन:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त चन्द्रमा भी घटता-बढ़ता रहता है। उसका घटता-बढ़ता चक्र कभी नहीं टूटता। ये सब बातें जानकर, मुझे चन्द्रलोक में जाने की अथवा घटता-बढ़ता चक्र में फँसने की कोई इच्छा नहीं है ॥55॥
 
Apart from this, the moon keeps on waxing and waning. Its cycle of waxing and waning never breaks. Knowing all these things, I do not have any desire to go to the moon world or to get caught in the cycle of waxing and waning. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)