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mahabharat 12.331.4: प्यास से व्याकुल, दुःखी और असहाय अवस्था में जीने की इच्छा रखने वाले मनुष्य का शरीर विनाश की ओर खिंचता रहता है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.331.4 
व्यथितस्य विधित्साभिस्ताम्यतो जीवितैषिण:।
अवशस्य विनाशाय शरीरमपकृष्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
प्यास से व्याकुल, दुःखी और असहाय अवस्था में जीने की इच्छा रखने वाले मनुष्य का शरीर विनाश की ओर खिंचता रहता है ॥4॥
 
The body of a person who is distressed by thirst, sad and wishes to live in a helpless state, keeps getting pulled towards destruction. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)