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mahabharat 12.331.37: यदि हमारे पुरुषार्थ का फल हमारे हाथ में होता, तो मनुष्य न तो वृद्ध होते, न मरते। उनकी सब इच्छाएँ पूरी होतीं और किसी को भी कोई अप्रिय वस्तु न सहनी पड़ती ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.331.37 
न म्रियेरन् न जीर्येरन् सर्वे स्यु:सर्वकामिन:।
नाप्रियं प्रति पश्येयुरुत्थानस्य फले सति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
यदि हमारे पुरुषार्थ का फल हमारे हाथ में होता, तो मनुष्य न तो वृद्ध होते, न मरते। उनकी सब इच्छाएँ पूरी होतीं और किसी को भी कोई अप्रिय वस्तु न सहनी पड़ती ॥37॥
 
If the fruits of our efforts were in our hands, then men would neither grow old nor die. All their desires would be fulfilled and no one would have to face anything unpleasant. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)