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mahabharat 12.331.32: वे नाना प्रकार के काढ़े और घी पीते हैं, परन्तु देखा जाता है कि बुढ़ापा उनकी पीठ को ऐसे झुका देता है जैसे बड़े-बड़े हाथी वृक्षों को झुका देते हैं ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.331.32 
ते पिबन्त: कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमै:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वे नाना प्रकार के काढ़े और घी पीते हैं, परन्तु देखा जाता है कि बुढ़ापा उनकी पीठ को ऐसे झुका देता है जैसे बड़े-बड़े हाथी वृक्षों को झुका देते हैं ॥32॥
 
They drink various kinds of decoctions and ghee, but it is seen that old age bends their backs just as big elephants bend trees. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)