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mahabharat 12.331.2: अतः मनुष्य को स्वाभाविक रूप से ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि प्रयत्नशील मनुष्य को कभी दुःख नहीं होता। आत्मा सबसे अधिक प्रिय है; अतः आप उसे मृत्यु और रोगों के कष्टों से बचाएँ। 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 331: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.331.2 
स्वभावाद् यत्नमातिष्ठेद् यत्नवान् नावसीदति।
जरामरणरोगेभ्य: प्रियमात्मानमुद्धरेत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
अतः मनुष्य को स्वाभाविक रूप से ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि प्रयत्नशील मनुष्य को कभी दुःख नहीं होता। आत्मा सबसे अधिक प्रिय है; अतः आप उसे मृत्यु और रोगों के कष्टों से बचाएँ। 2॥
 
Therefore, man should naturally strive to attain knowledge; Because a man who makes efforts never faces sorrow. The soul is dearest above all; Therefore, please save him from the sufferings of death and diseases. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)