श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 33: व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.33.10 
वत्सलत्वाद् द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशय:।
व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्याम: स्त्रीवधं वयम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे अपने स्वजनों के प्रति स्नेह के कारण ऐसा अवश्य करेंगे। चूँकि धर्म का स्वरूप सूक्ष्म है, अतः हमें स्त्री-हत्या का पाप अवश्य ही भोगना पड़ेगा।॥10॥
 
O best of Brahmins! I have no doubt that they will surely do so because of their affection for their relatives. Since the nature of Dharma is subtle, we will surely have to bear the sin of killing a woman.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)