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श्लोक 12.329.55-56h  |
तत: कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु॥ ५५॥
तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुर:। |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् वह अनेक नये कर्म करता है और जैसे रोगी मनुष्य अस्वास्थ्यकर भोजन करके दुःख भोगता है, वैसे ही वह उन कर्मों से और अधिक दुःख भोगता है ॥55 1/2॥ |
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| Thereafter he performs many new deeds and just as a sick person suffers after eating unhealthy food, similarly he suffers more and more from those deeds. ॥ 55 1/2॥ |
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