श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 329: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  12.329.44-45 
इदं विश्वं जगत‍् सर्वमजगच्चापि यद् भवेत्।
महाभूतात्मकं सर्वं महद् यत् परमाश्रयात् ॥ ४४॥
इन्द्रियाणि च पञ्चैव तम: सत्त्वं रजस्तथा।
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञक:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
यह सम्पूर्ण चराचर जगत पाँच महाभूतों से उत्पन्न हुआ है। इसीलिए यह महाभूतस्वरूप है। शरीर से परे जो है, वह महातत्त्व अर्थात् बुद्धि, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्म महाभूत अर्थात् तन्मात्राएँ, पाँच प्राण और सत्व आदि गुण - इन सत्रह तत्त्वों के समुदाय का नाम अव्यक्त है।
 
This entire living world has originated from the five great elements. That's why it is Mahabhutswarup. That which is beyond the body, that Mahatattva i.e. intellect, five senses, five subtle Mahabhutas i.e. tanmatras, five pranas and Sattva etc. qualities – the name of the community of these seventeen elements is Avyakt.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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