श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.326.48 
नास्ति ते सुखदु:खेषु विशेषो नासि लोलुप:।
नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
तुम सुख-दुःख का भेद नहीं समझते । तुम्हारे मन में लोभ नहीं है । न तुम्हें नृत्य देखने की इच्छा है, न गीत सुनने की । किसी विषय में तुम्हारी आसक्ति नहीं है ॥48॥
 
You do not understand the difference between happiness and sorrow. There is no greed in your mind. You neither have the desire to see a dance nor to listen to a song. You do not develop attachment towards any subject. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)