श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.326.47 
भवांश्चोत्पन्नविज्ञान: स्थिरबुद्धिरलोलुप:।
व्यवसायादृते ब्रह्मन्नासादयति तत्परम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! तुम्हें ज्ञान प्राप्त हो गया है। तुम्हारी बुद्धि स्थिर हो गई है और तुमने सांसारिक सुखों की लालसा पूरी तरह त्याग दी है, किन्तु शुद्ध निश्चय के बिना कोई भी भगवत्पद को प्राप्त नहीं कर सकता। ॥47॥
 
O Brahman! You have attained knowledge. Your intellect is stable and you have completely lost all lust for worldly pleasures, but without pure determination, no one can attain the state of God. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)