श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 326: राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.326.44 
अधिकं तव विज्ञानमधिका च गतिस्तव।
अधिकं तव चैश्वर्यं तच्च त्वं नावबुध्यसे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारी गति और तुम्हारा ऐश्वर्य- ये सब महान हैं; परंतु तुम इसे नहीं जानते ॥44॥
 
Your knowledge, your speed and your opulence—all these are great; but you are not aware of this. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)